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ललित शर्मा
परिचय क्या दूँ मैं तो अपना, नेह भरी जल की बदरी हूँ। किसी पथिक की प्यास बुझाने, कुँए पर बंधी हुई गगरी हूँ। मीत बनाने जग मे आया, मानवता का सजग प्रहरी हूँ। हर द्वार खुला जिसके घर का, सबका स्वागत करती नगरी हूँ।
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एलोरा के शिल्पियों को नमन

विश्वकर्मा गुफ़ा एलोरा
बचपन में मैने अपने स्कूली पाठ्यक्रम की किताबों में अजंता और एलोरा को पढा था। यहां की अद्भुत शिल्पकला के विषय में जाना था। यहां निर्मित भित्ति चित्रों के विषय में पढा था। तभी से मेरे मन में इन्हे देखने की उत्कट आकांक्षा थी। कब समय मिले और इस अद्भुत शिल्पकार्य को देखा जाए।वह समय आ ही गया, जब हम कुछ मित्रों के साथ अजंता और एलोरा की गुफ़ाएं देखने निकल पड़े। सबसे पहले हम एलोरा पहुंचे। पहुंचने पर वहां रात हो चुकी थी। रात को गुफ़ाएं बंद रहती हैं। वहां प्रकाश की कोई व्यवस्था नहीं है। इसलिए हमने रात में एलोरा में ही रुकना तय किया। वहां एक अच्छा होटल है लेकिन हमारे लिए कुछ मंहगा था इसलिए हमने एक लाज में रुकना तय किया।

सुबह स्नानादि से निवृत होकर एलोरा की गुफ़ाएं देखने निकल पड़े। यहां आने पर पता चला कि एक नहीं पूरी 34 गुफ़ाएं है तथा इनको देखने के लिए आपके पास पर्याप्त समय होना चाहिए। ये गुफ़ाएं बेसाल्टिक की पहाड़ी के किनारे किनारे बनी हुई हैं। इन गुफ़ाओं में हिन्दु, जैन, एवं बौद्ध तीनों धर्मों की जानकारी मिलती है। गुफ़ा नम्बर एक को विश्वकर्मा गुफ़ा के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि ये गुफ़ाएं 350 से 700 ईसा पश्चात अस्तित्व में आई है। दक्षिण की ओर की 12 गुफ़ाएं बौद्ध धर्म एवं मध्य की 17 गुफ़ाएं हिन्दु धर्म एवं उत्तर की 
 5गुफ़ाएं जैन धर्म पर आधारित हैं।

हिन्दू गुफ़ाओं में एक गुफ़ा तो एक ही पहाड़ को काट कर बनाई गयी है। इस गुफ़ा में मंदिर, हाथी, और दो मंजिली इमारत छेनी हथौड़ी से तराश कर बनाई गयी है। जब मैने शिल्पकारों की इस कारीगरी को देखा तो मैं उनके सामने नत मस्तक हो गया। क्योंकि छेनी हथौड़ी से तराश कर भव्य निर्माण करना धैर्य एवं श्रम साध्य कार्य है। इसे देख कर ऐसा नहीं लगता कि इस कार्य को किसी मानव ने अंजाम दिया है। लगता है किसी असीम शक्ति के मालिक या किसी महामानव ने निर्माण कार्य को अंजाम दिया है। पहाड़ को काटकर निर्माण करने में कई सदियां लग गयी होंगी।

मैने प्रत्येक गुफ़ा के शिल्प कार्य का बारीकी से अध्ययन किया। मित्र नाराज हो रहे थे और जल्दी चलो की गुहार लगा रहे थे। मैने कह दिया कि अगर तुम्हें जल्दी है तो चले जाओ, मैं आराम से देख कर आ जाऊंगा। मेरे थोड़ा डपटने पर उन्होने धैर्य रखा। मैने गुफ़ाओं के कुछ चित्र भी लिए। गुफ़ाओं की विशालता देखकर मैं आश्चर्य चकित था। जिसे बचपन से पढता रहा था वे अब मेरे सामने थे। अद्भुत आनंद था जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। कभी मौका लगेगा तो एक बार फ़िर से देखना चाहुंगा।

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भीम सेन जोशी

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Dil ka hal sune dil wala (420)

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मंगल भवन अमंगल हारी

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आ री निंदिया

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